50 वर्ष की उम्र के बाद नींद की समस्या को नजरअंदाज करना कामकाजी जीवन पर भी असर डाल सकता है। फिनलैंड के University of Turku के शोधकर्ताओं के अध्ययन में नींद की गंभीर परेशानियों और कम working life expectancy के बीच संबंध पाया गया है।
अध्ययन के अनुसार, जिन लोगों को नींद से जुड़ी गंभीर समस्याएं थीं, उनकी 50 से 68 वर्ष की उम्र के बीच अनुमानित working life उन लोगों की तुलना में करीब आठ महीने कम थी, जिन्हें ऐसी समस्या नहीं थी।
वहीं, मध्यम स्तर की नींद संबंधी परेशानी वाले लोगों की working life करीब पांच महीने कम पाई गई।
शोधकर्ताओं ने बताया कि यह संबंध महिला और पुरुष दोनों में तथा अलग-अलग तरह की नौकरियों में देखा गया।
नींद की किन समस्याओं को अध्ययन में शामिल किया गया?
शोध में नींद से जुड़ी कई तरह की परेशानियों को देखा गया।
इनमें सोने में कठिनाई, रात में बार-बार जागना और सुबह बहुत जल्दी नींद खुलना शामिल था।
इसके अलावा, पर्याप्त समय सोने के बावजूद सुबह तरोताजा महसूस न करना भी sleep disturbance के दायरे में रखा गया।
इस तरह, अध्ययन ने केवल रात में सोने के कुल घंटों को नहीं देखा। नींद की quality और उससे जुड़ी परेशानियों पर भी ध्यान दिया गया।
50 से 68 साल की उम्र के बीच कामकाजी जीवन का आकलन
शोधकर्ताओं ने Finnish Public Sector Study और Health and Social Support Study के data का इस्तेमाल किया।
प्रतिभागियों की 50 वर्ष की उम्र के बाद नींद से जुड़ी आदतों और समस्याओं का आकलन किया गया।
इसके बाद researchers ने 50 से 68 वर्ष की उम्र के बीच working life expectancy का अनुमान लगाया।
University of Turku के शोधकर्ताओं का काम sleep, ageing और working life से जुड़े विषयों पर केंद्रित रहा है। शोधकर्ता Saana Myllyntausta की विशेषज्ञता में sleep research और ageing workers भी शामिल हैं।
सात से साढ़े आठ घंटे की नींद वालों का आंकड़ा
अध्ययन में रात की नींद को तीन समूहों में बांटा गया।
पहला समूह सात घंटे से कम सोने वालों का था। दूसरा समूह सात से साढ़े आठ घंटे सोने वालों का था।
तीसरे समूह में वे लोग शामिल थे, जो नौ घंटे या उससे अधिक सोते थे।
अध्ययन के अनुसार, सात घंटे से कम और सात से साढ़े आठ घंटे सोने वाले लोगों की 50 वर्ष की उम्र के बाद estimated working life करीब 13 साल दो महीने रही।
वहीं, नौ घंटे या उससे अधिक सोने वाले लोगों में यह अवधि करीब 12 साल पांच महीने रही।
लंबे समय तक सोने का आंकड़ा अलग क्यों रहा?
शोध की प्रमुख शोधकर्ता डॉ. साना मायलिन्ताउस्ता ने कहा कि सात घंटे से कम और सात से नौ घंटे के आसपास सोने वाले लोगों के working life estimates में बड़ा अंतर नहीं मिला।
हालांकि, लंबे समय तक सोना कम working life और खराब health outcomes से जुड़ा पाया गया।
इसका मतलब यह नहीं है कि ज्यादा सोना अपने आप कामकाजी जीवन को कम करता है। शोध में ऐसे संबंध देखे गए हैं, लेकिन इनके पीछे अन्य health factors भी हो सकते हैं।
यही वजह है कि study के findings को cause-and-effect के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।
महिलाओं और पुरुषों में भी देखा गया अंतर
अध्ययन में sleep problems और working life expectancy के बीच संबंध को gender के आधार पर भी देखा गया।
सबसे लंबी working life expectancy उन professional महिलाओं में देखी गई, जिन्हें नींद की समस्या नहीं थी। यह अवधि करीब 14 साल थी।
इसके विपरीत, गंभीर sleep problems वाले routine work करने वाले पुरुषों में यह अवधि करीब 12.5 साल रही।
हालांकि, researchers ने इस संबंध को केवल gender के आधार पर समझने से बचने की जरूरत बताई है।
50 की उम्र के बाद नींद पर ध्यान क्यों जरूरी?
उम्र बढ़ने के साथ sleep pattern में बदलाव आ सकते हैं। कुछ लोगों को रात में बार-बार जागने या जल्दी नींद खुलने जैसी समस्या हो सकती है।
इसके अलावा, काम का तनाव, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और lifestyle भी नींद को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए लगातार खराब नींद को केवल सामान्य उम्र बढ़ने का हिस्सा मानकर छोड़ना उचित नहीं है।
अगर नींद की समस्या लंबे समय तक बनी रहती है, तो healthcare professional से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।
अनिद्रा और खराब नींद का काम पर असर
अच्छी नींद शरीर और दिमाग की सामान्य functioning के लिए जरूरी है।
लगातार खराब नींद से दिन में थकान, ध्यान लगाने में कठिनाई और कामकाज में परेशानी महसूस हो सकती है।
ऐसे में, लंबे समय तक sleep problems रहने पर व्यक्ति की overall health और work performance दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
लेकिन हर व्यक्ति में इसका असर अलग हो सकता है।
किन लोगों को ज्यादा ध्यान देना चाहिए?
शोधकर्ताओं ने middle age में sleep health पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई है।
उन्होंने खासकर कम सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले लोगों के बीच इस मुद्दे पर ध्यान देने की बात कही।
इसके अलावा, workplace health programmes में sleep awareness को शामिल करने की जरूरत भी बताई गई है।
ऐसे programmes कर्मचारियों को sleep hygiene और समय पर मदद लेने के बारे में जानकारी दे सकते हैं।
अनिद्रा के इलाज में क्या मदद मिल सकती है?
शोधकर्ताओं के अनुसार, insomnia के इलाज के लिए occupational health services के माध्यम से therapy मददगार हो सकती है।
कुछ मामलों में cognitive behavioral therapy for insomnia (CBT-I) का इस्तेमाल किया जाता है।
यह therapy नींद से जुड़ी आदतों और विचारों को बेहतर बनाने पर काम करती है।
हालांकि, किसी व्यक्ति के लिए कौन-सा treatment उचित है, यह उसकी health condition और sleep problem के कारण पर निर्भर करता है।
इसलिए लंबे समय तक अनिद्रा रहने पर डॉक्टर या sleep specialist से सलाह लेना बेहतर है।
नींद बेहतर करने के लिए क्या करें?
नींद की quality सुधारने के लिए कुछ सामान्य आदतें मददगार हो सकती हैं।
- रोज लगभग एक ही समय पर सोने और उठने की कोशिश करें।
- सोने से पहले बहुत ज्यादा caffeine लेने से बचें।
- रात में बहुत देर तक मोबाइल या दूसरे screens इस्तेमाल न करें।
- सोने की जगह को शांत और आरामदायक रखें।
- दिन में नियमित physical activity करें।
- दिन में लंबे समय तक सोने से बचें, खासकर अगर इससे रात की नींद प्रभावित होती हो।
- शराब या nicotine का इस्तेमाल नींद सुधारने के लिए न करें।
साथ ही, अगर इन बदलावों के बावजूद समस्या बनी रहती है, तो healthcare professional से सलाह लें।
अध्ययन की क्या सीमाएं हैं?
शोधकर्ताओं ने अध्ययन की कुछ limitations भी स्वीकार की हैं।
उनके अनुसार, physical और mental health, पहले से मौजूद बीमारियों, health-related habits और shift work जैसे सभी factors को पूरी तरह शामिल नहीं किया जा सका।
इसलिए, नींद की समस्या और कम working life expectancy के बीच सीधे cause-and-effect संबंध का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
आगे के research में इन factors को शामिल करके इस संबंध को और बेहतर समझने की जरूरत है।
क्या खराब नींद से नौकरी जरूर छूटती है?
नहीं। इस अध्ययन से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि नींद की समस्या होने पर किसी व्यक्ति की नौकरी निश्चित रूप से कम हो जाएगी।
अध्ययन ने population level पर sleep problems और estimated working life expectancy के बीच association देखा है।
किसी व्यक्ति का working life कई factors पर निर्भर करता है। इसमें health, occupation, workplace conditions, retirement decisions और व्यक्तिगत परिस्थितियां शामिल हो सकती हैं।
इसलिए, अध्ययन के आंकड़ों को व्यक्तिगत भविष्यवाणी के रूप में नहीं देखना चाहिए।
निष्कर्ष
फिनलैंड के University of Turku के शोधकर्ताओं के अध्ययन में 50 वर्ष की उम्र के बाद नींद की समस्याओं और कम working life expectancy के बीच संबंध सामने आया है।
गंभीर sleep problems वाले लोगों में 50 से 68 वर्ष की उम्र के बीच अनुमानित working life करीब आठ महीने कम पाई गई। मध्यम sleep problems वाले लोगों में यह अंतर करीब पांच महीने था।
हालांकि, यह observational research है। इसलिए इससे यह साबित नहीं होता कि नींद की समस्या सीधे तौर पर working life को कम करती है।
फिर भी, अध्ययन middle age में sleep health पर ध्यान देने की जरूरत को रेखांकित करता है। लगातार अनिद्रा या खराब नींद की समस्या होने पर इसे नजरअंदाज करने के बजाय उचित medical advice लेना बेहतर है।



